नागरिकों की आवाज़ के लिए लोकतंत्र में वास्तविक जगह कितनी बची है?

आकृति चौधरी के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत उनकी हिरासत को निरस्त करते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और पाँच लाख रुपये की क्षतिपूर्ति आकृति चौधरी को दिए जाने का निर्देश दिया, जिसकी वसूली संबंधित अधिकारियों के वेतन से किए जाने की बात कही गई। न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों की सेवा पुस्तिका में अपनी अप्रसन्नता दर्ज करने का भी निर्देश दिया।

यह आदेश अपने आप में बहुत गंभीर था, क्योंकि एक ओर राज्य की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल किया गया और दूसरी ओर उच्च न्यायालय ने उपलब्ध सामग्री तथा निरोध की प्रक्रिया को संविधान की कसौटी पर पर्याप्त नहीं पाया।

इसके बाद मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार उच्चतम न्यायालय पहुँचे। 23 सितम्बर को मामला न्यायमूर्ति सतीश चन्द्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ के सामने आया। यहीं से मामला केवल एक प्रशासनिक आदेश को चुनौती देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उच्चतम न्यायालय में मामलों की सूचीबद्धता और न्यायिक पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठने लगे।

प्रकाशित न्यायिक कार्य-वितरण सूची में 13 जुलाई 2026 से प्रभावी व्यवस्था के अनुसार निवारक निरोध और बंदी प्रत्यक्षीकरण से जुड़े विषयों का सामान्य आवंटन दूसरी पीठों के पास था, जबकि मेधा रूपम की याचिका न्यायमूर्ति शर्मा की पीठ के सामने पहुँची। यह अपने आप में किसी अनुचित उद्देश्य का प्रमाण नहीं है, क्योंकि विशेष रूप से किसी मामले को किसी पीठ के सामने भेजने की प्रशासनिक शक्ति मुख्य न्यायाधीश के पास होती है; लेकिन सवाल यह जरूर है कि सामान्य कार्य-वितरण से अलग इस मामले की सूचीबद्धता का आधार क्या था।

और सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि इसी प्रकरण से जुड़े अन्य निवारक निरोध के मामले न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की पीठ के सामने लंबित बताए गए हैं। ऐसे में सामान्य नागरिक का यह पूछना अस्वाभाविक नहीं है कि जब एक ही घटनाक्रम से जुड़े मामले न्यायालय में पहले से किसी पीठ के सामने विचाराधीन हों, तब उससे संबंधित दूसरी याचिका को अलग पीठ के सामने सूचीबद्ध करने का प्रशासनिक आधार क्या था।

यह पूछना न्यायपालिका के विरुद्ध आरोप लगाना नहीं है; बल्कि न्यायपालिका से पारदर्शिता की अपेक्षा करना है। यदि इसका कोई स्पष्ट प्रशासनिक कारण है तो उसे सामने रखने में किसी संस्था की गरिमा कम नहीं होती, बल्कि सार्वजनिक विश्वास और मजबूत होता है।

मामले को और संवेदनशील बनाने वाला तथ्य यह है कि मेधा रूपम मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पुत्री हैं और प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार न्यायमूर्ति सतीश चन्द्र शर्मा के पुत्र का भारत निर्वाचन आयोग से विधिक पेशेवर संबंध रहा है। इन दो तथ्यों को जोड़कर किसी प्रकार के पक्षपात, प्रभाव या मिलीभगत का निष्कर्ष निकाल देना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन न्यायपालिका जैसी संस्था में केवल वास्तविक पक्षपात से बचना ही पर्याप्त नहीं माना जाता; ऐसी परिस्थितियों में भी पारदर्शिता आवश्यक होती है जिनसे सामान्य नागरिक के मन में प्रश्न पैदा हो सकते हैं।

इसलिए प्रश्न व्यक्ति विशेष पर आरोप का नहीं, बल्कि व्यवस्था की पारदर्शिता का है—क्या ऐसी परिस्थिति में सूचीबद्धता का कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए था?

23 सितम्बर की कार्यवाही में सुनवाई के दौरान वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग की आवाज बंद किए जाने और मीडिया की पहुँच सीमित होने की भी रिपोर्ट सामने आई। इसके बाद अगले दिन उच्चतम न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश को स्पष्ट किया। यह स्पष्टीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है—उच्च न्यायालय द्वारा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत हिरासत निरस्त करने वाला निर्णय स्थगित नहीं किया गया है; रोक मुख्यतः जिलाधिकारी के विरुद्ध की गई टिप्पणियों और पाँच लाख रुपये की क्षतिपूर्ति संबंधी निर्देश पर है।

अब सवाल सरकार से भी है। सरकार को कानून लागू करने का अधिकार है, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व है और कानून द्वारा दी गई परिस्थितियों में कठोर कार्रवाई करने की शक्ति भी है। लेकिन सरकार को संविधान से बाहर जाने की शक्ति नहीं है। अनुच्छेद 19 नागरिक को बोलने, अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर संविधान द्वारा निर्धारित सीमाएँ लगाई जा सकती हैं, लेकिन सरकार की असहमति स्वयं किसी नागरिक के अधिकार को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकती।

यदि कोई व्यक्ति हिंसा करता है या कोई वास्तविक अपराध करता है तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन किसी विचार, असहमति या शांतिपूर्ण विरोध को अपराध मान लेना लोकतांत्रिक शासन की संवैधानिक सीमा के भीतर नहीं आता।

जनता के सामने भी आज यही विडंबना है। जनता सरकार बदल सकती है, चुनाव में सत्ता का फैसला कर सकती है, शांतिपूर्ण विरोध कर सकती है, न्यायालय जा सकती है और सूचना मांग सकती है; लेकिन न्यायपालिका को अपनी इच्छा से नहीं चला सकती, किसी अधिकारी को सड़क पर दंडित नहीं कर सकती और न्यायिक प्रक्रिया का स्थान भीड़ नहीं ले सकती। इसलिए लोकतंत्र में जनता की शक्ति केवल चुनाव में सरकार बदलने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

जनता को सरकार से सवाल पूछना है, प्रशासन से सवाल पूछना है, न्यायपालिका की प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल पूछना है और मीडिया से भी सवाल पूछना है कि वह सत्ता के सामने कितनी स्वतंत्रता से खड़ा है।

और यहीं तथाकथित चौथे स्तम्भ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि मीडिया ही सत्ता, प्रशासन और न्यायपालिका से असुविधाजनक प्रश्न पूछना छोड़ दे तो नागरिक के पास सही सूचना कहाँ से आएगी? रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की 2026 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूची में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है, जबकि 2025 में भारत 151वें स्थान पर था।

यह किसी भारतीय न्यायालय का फैसला नहीं है और न ही इससे प्रत्येक पत्रकार या प्रत्येक समाचार संस्था के बारे में कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है, लेकिन यह एक अंतरराष्ट्रीय प्रेस-स्वतंत्रता आकलन है जिसे लोकतांत्रिक सूचना-व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर सार्वजनिक चर्चा का आधार अवश्य बनाया जा सकता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि सरकार से प्रश्न पूछना कठिन हो जाए, न्यायपालिका की प्रशासनिक प्रक्रिया पर प्रश्न उठाना असहज माना जाए और मीडिया स्वयं सत्ता से कठिन प्रश्न पूछने से पीछे हट जाए, तो आम नागरिक के पास बचेगा क्या? उसके पास संविधान है, अनुच्छेद 19 है, न्यायालय जाने का अधिकार है, सूचना का अधिकार है, शांतिपूर्ण असहमति का अधिकार है और अंततः मतदान का अधिकार है। इन्हीं अधिकारों के सहारे नागरिक सत्ता को बदल भी सकता है और सत्ता से जवाब भी मांग सकता है।

लेकिन लोकतंत्र तभी जीवित रहेगा जब जनता केवल यह पूछने तक सीमित नहीं रहेगी कि अगली सरकार किसकी होगी, बल्कि यह भी पूछेगी कि जो भी सरकार होगी, वह संविधान के भीतर कितनी रहेगी।

इसलिए आकृति चौधरी का मामला किसी एक व्यक्ति या किसी एक अधिकारी के पक्ष या विपक्ष का मामला बनाकर छोड़ देना इस पूरे घटनाक्रम को छोटा कर देना होगा। असली सवाल यह है कि राज्य की शक्ति की सीमा कहाँ है, न्यायिक शक्ति की पारदर्शिता कितनी है और नागरिक की आवाज के लिए लोकतंत्र में वास्तविक जगह कितनी बची है। किसी पर बिना प्रमाण आरोप लगाना भी गलत है और किसी संस्था को प्रश्नों से ऊपर मान लेना भी।

प्रमाण सामने रखिए, अभिलेख सामने रखिए, सूचीबद्धता का आधार सामने रखिए, न्यायिक आदेश सामने रखिए—फिर जनता को अपने प्रश्नों का उत्तर स्वयं समझने दीजिए। यही संविधान का रास्ता है और यही अनुच्छेद 19 की वह स्वतंत्रता है जिसके सहारे नागरिक सत्ता से कह सकता है—सत्ता आपकी हो सकती है, लेकिन संविधान आपका नहीं, जनता का है।

(महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स (एलसीपीआर) के संयोजक हैं।)

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